ज़्यादा नहीं बस
तुम्हारे आस-पास
कुछ वक़्त बिताना चाहती हूँ
तुम्हारे बालों को सहलाते हुए
बस नींद का भारीपन
तुम्हारी आँखों में देखना चाहती हूँ
तुम्हारे हाथों पर अपने हाथ रखकर
तुमको चिढ़ाना चाहती हूँ
मैं गोरी तुम काले
तुम्हारे बाजुओं से लगकर
कोई फ़िल्म देखते हुए
सो जाना चाहती हूँ
तुम्हारे साथ मिलकर
बोतल में पौधे उगाकर
उनको हरा होते देखना चाहती हूँ
तुम्हारे हाथों का बना
कच्चा पक्का खाना खाते हुए
तुम्हारे आधे अधूरे गाने सुनना चाहती हूँ
तुमको बहुत पास आकर
कानों के पीछे छूकर तुमको
उकसाना चाहती हूँ
तुम्हारे स्पर्श को सहेजना चाहती हूँ
तुम्हारे साथ बहकना चाहती हूँ
मैं चाहती हूँ कॉफी के मग लेकर
बालकनी में बैठना और
तुमको देखते हुए
तुमसे तुम्हारे ही किस्से सुनना
मैं चाहती हूँ दुनिया को
छोटे छोटे टुकड़ों में घूमना
नदियों को नापना , पहाड़ों को जीतना
मैं तुम्हारे साथ बस जीना चाहती हूँ
मैं बस तुम्हारे होंठों के स्पर्श से
कांप जाना चाहती हूँ
मैं तुमको उस तरह देखना चाहती हूँ
जिस तरह ईव ने आदम को देखा था
मैं तुमको उस तरह देखना चाहती हूँ
जिस तरह ईश्वर ने
इंसान को बनाने के बाद
उसमें प्रेम भरते हुए
उसे भर नज़र देखा था